बीसवीं सदी में आज मनुष्य के हाथ जिस का नाम (आरटीआई) सूचना का अधिकार जैसा हथियार लग गया है जो देशवासियों के लिए ब्रह्मास्त्र साबित हो रहा है. वैसे तो देश में लोकतंत्र आजादी से पहले से ही जन्म ले चुका है लेकिन असली आजादी इस अधिकार रूपी हथियार के रूप में अब मिली है. हम 70-75 वर्ष पहले के भारत को देखें तो हर व्यक्ति अपने अधिकार को एक ऐसे व्यक्ति के हाथ में सौंप देता था जिसे राजा कहा जाता था. उस समय भी मानव स्वतंत्र तो था, लेकिन अपने राजा के आगे उसे अपने हक व अधिकार का उपयोग करना एक तरह से मना ही था. अंग्रेजों के आने के बाद देश की शासन व प्रशासन प्रणाली वैसी नहीं रही और अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद देश की शासन व प्रशासन प्रणाली फिर बदली. ठीक उसी तरह 12 अक्टूबर 2005 को देश के हर व्यक्ति को मानवाधिकार प्राप्त हुआ जिसका नाम सूचना का अधिकार (आरटीआई) है. इस अधिकार के प्राप्त होते ही देश में एक नए लोकतंत्र का उदय हुआ.
सूचना के अधिकार के माध्यम से देश के हर नागरिक को देश व प्रदेशों के शासन व प्रशासन से उसके कार्य को लेकर व नागरिक से जुड़े हर पहलू के बारे में सवाल करने के लिए नई लोकतांत्रिक भूमिका में ला खड़ा कर दिया है. इस अधिकार के तहत देश के हर नागरिक को अपने प्रलंबित कामों के लिए सरकारी दफ्तरी बाबुओं के आगे गिड़गिड़ाने की आवश्यकता नहीं रही. अगर आप का काम नहीं हुआ तो आप सरकारी कर्मचारी व बड़े अधिकारी तक को अपने सवालों के घेरे में लेकर उनसे पूछ सकते हैं कि आपने मेरा काम क्यों नहीं किया. इस बात को कहने में भी संकोच नहीं रहा कि आपको महीने भर की पगार किस काम की दी जाती है? यही सूचना का अधिकार ब्रह्मास्त्र बनकर हर नागरिक के हाथ लगा है जिसके आगे हर कोई नतमस्तक है.
लेकिन यह कानून लागू क्यों हुआ? आज कई लोगों के दिमाग को यह बात सुन्न कर चुकी है. असल में सूचना का अधिकार देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने का नाम है. भ्रष्टाचार नामक दीमक को नष्ट करना है जो देश की जड़ों में लग चुकी है और हर साख तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. वैसे तो स्वीडन विश्व का पहला देश है जिसने 240 वर्ष पहले सूचना का अधिकार लागू किया था. वहीं 1766 को (फ्रीडम ऑफ प्रैस) एक्ट पारित हुआ था. उसके बाद फिनलैंड में 1959 को कानून के रूप में सूचना का अधिकार लागू हुआ. उसके बाद अमेरिका में 1966 में कानून लागू हुआ. इसी तरह हर दो-तीन वर्षों के बाद विदेशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा, न्यूजीलैंड आदि देशों में सूचना का अधिकार लागू हुआ था.
भारत में सिर्फ राजस्थान पहला राज्य है जिसने सूचना का अधिकार लागू करने की कोशिश की. यहां पर मजदूर संगठनों ने मिलकर आंदोलन किया और देश में पहला कानून सूचना का अधिकार राजस्थान की बजाय तमिलनाडू में 17 अप्रैल 1997 को लागू हुआ. इसके तीन महीने बाद गोवा, उसके बाद मध्य प्रदेश, 2000 को कर्नाटक व 2001 में दिल्ली के बाद महाराष्ट्र में 2002 को सूचना का अधिकार लागू हुआ. यह कानून बनाने के लिए राजस्थान के निखिल डे, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल व महाराष्ट्र के अन्ना हजारे ने बहुत बड़ा योगदान दिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने पूरे देश में 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून सूचना का अधिकार लागू कर दिया. कानून के लागू होते ही कई शहरों व विभागों में हड़कंप मच गया. कुछ लोगों के खुशी से चेहरे लाल हो गए और कुछ बगलें झांकने को मजबूर हुए.
लेकिन आरटीआई है क्या और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए, अभी तक पूरी तरह से मालूम नहीं था. मगर फिर भी देश के हर एक व्यक्ति को इसकी परिभाषा का ज्ञान एक दूसरे के माध्यम से हो रहा है, आज देश में कई बड़े शहरों में सूचना का अधिकार के नाम से संगठन, बड़े क्लब व कई समूह बन चुके हैं. जिनके माध्यम से नागरिकों को सूचना अधिकार का सही उपयोग बताया जा रहा है. इतना होने के बावजूद इसका सही उपयोग कुछ प्रतिशत ही हो रहा है. कुछ लोगों की सोच तो बिल्कुल इस कानून के विपरीत होती नजर आ रही है.
अगर अपने विभाग में किसी कर्मचारी की अपने अधिकारी से अच्छी बनती है या फिर अधिकारी के किसी मशहूर नेता से अच्छे संबंध हैं, उसके यहां आना जाना है तो उसी विभाग का कोई कर्मचारी झट से आरटीआई आवेदक के पास पहुंच जाता है और अपनी विभाग की कई जानकारियां देते हुए विभाग में कर्मचारी, अधिकारी या विभाग से जुड़ी जानकारियां प्राप्त करने के लिए आवेदन करवाता है. और फिर जब तक उस विभाग से जानकारी नहीं आ जाती तब तक कर्मचारी की आंखें विभाग के हर कर्मचारी की हरकतों पर गड़ी रहती है. अपने कार्य की तरफ कम और दूसरे की हरकतों पर ज्यादा ध्यान रहता है ऐसा क्यों? शायद इसीलिए कि जिस कर्मचारी के माध्यम से सूचना के अधिकार में सूचना मिली है, उस कर्मचारी को उसके हक(अपनी तरफ से बना लिए गए सुविधा शुल्क) की सही कीमत नहीं मिली होगी, या फिर विभाग में जितना पैसा आया था उसमें से कुछ प्रतिशत हिस्सा बड़े अधिकारी ने अपने हित के लिए खर्च कर लिया होगा और जिसके बंटवारे में वह कर्मचारी भी माल कूटना चाहता होगा जिसने आरटीआई के माध्यम से जानकारी लेने के लिए आवेदन करवाया है. अब अधिकारी की तो वाट लग गई. ऐसे ही कई मामले बड़े देशों से लेकर छोटे शहरों तथा गांवों तक में सामने आ रहे है. कई विभागों व संस्थाओं की सूचना प्राप्त करने के बाद कुछ भी घोटाला या भ्रष्टाचार जैसा साबित कुछ भी नहीं होता. मगर विभाग की 15 से 20 दिनों तक जान आफत में आ जाती है.
आज देश में ग्रामीण रोजगार के तहत देश के देहाती बड़े-छोटे शहरों व गांव में मनरेगा का कार्य जोर-शोर से चल रहा है और इसका फायदा गांव में रहने वाले काफी लोगों को हुआ है. इससे रोजगार भी मिला, धन भी मिला, साथ ही साथ अपने ही गांव में पानी, स्कूल तथा सड़कों का कई प्रकार से विकास हुआ. जो लोग रोजगार कमाने के लिए घर से बाहर जाते थे उन्हें अब मनरेगा में घर पर ही रोजगार मिल रहा है. इस कार्य में सबसे ज्यादा महिलाएं आगे आई हैं. जिन महिलाओं ने कभी रुपयों को अपने हाथ में पकड़ कर ठीक ढंग से नहीं देखा था उन्होंने भी धन राशि एकत्रित करना सीख लिया है, लेकिन नरेगा में जितना ज्यादा धन और रोजगार है इसमें उतना ही भ्रष्टाचार भी पनप रहा है. मनरेगा में हुई धांधलियों का पर्दाफाश भी तो सूचना अधिकार के कारण ही हुआ है. इतना ही नहीं कई पंचायत कर्मचारियों के साथ-साथ प्रधानों को भी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाने पर अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है.
बहुत से आरटीआई आवेदक इसकी सही जानकारी प्राप्त करके दूसरे लोगों को जागरूक करने की बजाय इसका उपयोग भ्रष्टाचार फैलाने में कर रहे हैं. आज देश में सैंकड़ों विभाग ऐसे हैं जिनकी कार्यशैली पर किसी ने आज तक आंख तक नहीं उठाई है और इन विभागों में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, यह भी नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ लोग आरटीआई के माध्यम से विभागों की जानकारी प्राप्त कर पकड़ेे जाने पर बड़े अधिकारी से सांठगांठ करके भ्रष्टाचार के ऊपर पड़े परदे को उठाने के बजाय भ्रष्टाचार पर और परदा डाल रहे हैं. यह आरटीआई का उपयोग है या दुरूपयोग इस बात को भलीभांति जाना जा सकता है।
आज ज्यादातर लोग आरटीआई का उपयोग अपनी पैंशन, ऐरियर, प्रोमोशन या अपनी महीनेभर के पगार को बढ़ाने मात्र के लिए कर रहे हैं. लेकिन आरटीआई अपने हित के साथ-साथ जनता के कार्यहित में उपयोग लाने वाले कानून का नाम है न कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए. आरटीआई के माध्यम से हम अपने गांव या शहर में आने वाले पैसों का सही उपयोग जान सकते हैं. धनराशि जनता के कार्य में लग रही है कि नहीं, यह जानकारी सूचना अधिकार के माध्यम से ले सकते हैं तथा किसी भी विभाग में होने वाले घोटाले या भ्रष्टाचार को खत्म करने में आरटीआई सक्षम है. देश में आरटीआई के माध्यम से हजारों लोगों के साथ-साथ विभागों और प्रशासन को भी फायदा हुआ हैं. विभागों में बैठे हुए कई भ्रष्ट कर्मचारियों को भी आरटीआई की माध्यम से ही पकड़ा गया है. आज देश के जरूरतमंदों को अनाज, मकान व रोजगार तक आरटीआई के माध्यम से ही प्राप्त हुआ है. कई गांवों को अपना अधिकार मिला है और इन गांव में वर्षों से रुकी हुई कार्ययोजना को भी आरटीआई के माध्यम से नया रूप मिला है, लेकिन भ्रष्टाचार की दीमक अभी भी कई विभागों में सरकारी धन व जनता के अधिकारों को चाटने में लगी हुई है, जिसको बाहर निकाल फेेंकना अति आवश्यक है.
Sunday, November 21, 2010
123 साल का हमला
बाडमेर पश्चिम राजस्थान का सीमावर्ती जिला बाडमेर अपनी लोक कला और संस्कृति के लिऐं जाना जाता हैं। यह सीमावर्ती जिला अपने खास खान ,पान,रहन-सहन और जिन्दा दिल्ली के लियें भी खास तौर से जाना जाता हैं। इस जिले के लोग अपनी शारीरिक बनावट,कद काठी के लिये मशहूर हैं। इस सीमावर्ती जिले के रामसर तहसील के अजबानी गांव कें निवासी हमला पुत्र जीया नें 123 बसंत पार कर लिऐं सम्भवत: हमला राजस्थान में सबसे अधिक आयु का जिन्दा व्यक्ति हैं। लगभग 253 सदस्यों कें परिवार का मुखिया हमला इस उम्र में भी बहुत जिन्दा दिल हैं। इसी क्षैत्र में दो महिला सहित चार शतकवीर हैं।इनमें से एक क्षेत्रिय विधायक की माताफातमा पत्नी दीना खान 106 साल,चनेसर खान 113 साल निवासी लाखेटाली हैं।वहीं 108 साल की श्रीमति वलिया पत्नी अदरीम निवासी सियाई तो आज भी घर के कामकाज निपटा रही हैं।जिला मुख्यालय सें लगभग 70 किलोमीटर दूर रामसर तहसील के गांव अजबानी से एक किमी दूर एक ढाणी के झोंपडे के बाहर खाट पर एक बुजुर्ग बैठा हैं।हाथ में लाठी लिऐं बकरियों को चरा रहा हैं।ये हैं 123 साल का राजस्थान का सम्भवत: यबसे बुजुर्ग व्यक्ति हमला पुत्र जीया।253 सदस्यों के परिवार का मुखिया हमला की सबसे बडी पुत्री अमरी 85 साल की हैं।अमरी का निकाह पीरे का पार निवासी चिनेसर से 1926 में हुआ था।यह गांव भारत पाकिस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान के सिन्ध प्रांत में चला गया।आजादी के बाद से हमला अपनी बेटी से नहीं मिला।हमला तीन बेटिया अमरीएहनु और सईदा हैं वहीं तीन पुत्र हैजम,जूमा और आदम हैं ।सबसे बडे पुत्र हैजम की उम्र भी इस वक्त 82 साल हैं।हमला का पड पोता अरबाब 23 साल का हैं।उसका भी निकाह हो रखा है।हमला नें अपनी लम्बी उम्र का राज बताते हूए कहा कि बाडमेर विभाजन से पहले अरब जानें का एक मात्र व्यापारिक रास्ता था।खाने की खूब सामग्री आती थी।खाना शुद्ध होता था।दूध,दही,छाछ,बाजरी , की रोटी या राब खाते नशा नहीं था।उसने बताया कि वह किसी के घर पानी भी नही पीता था।40 की उम्र में निकाह हुआ था।हमला की शरीक ए हयात की 22 साल पहले मृत्यु हो चुकी हैं।हमला ने बताया कि अब उम्र के इस पडाव में काफी कमजोर महसूस कर रहा हैं।हमला का लम्बा चौडा परिवार हैं।इस परिवार में लगभग 253 सदस्य हैं।मजे कि बात हैं कि हमला को वृद्धावस्था पेंशन तक नही मिलती।सरकारी सुविया का तनिक लाभ हमला या उसके परिवार को नही मिला।पूरे क्षैत्र में ईमानदारी के लिऐं हमला जाना जाता हैं।हमला अपना रोजमर्रा का काम काज खुद निपटाता हैं।उसकी इच्छा हें कि 125 वीं सालगिरह पर ख्वाजा साहब की दरगाह की जियारत करें इसके बाद उसे जीने की इच्छा नही।क्षैत्रीय विधायक और पंचायत राज्य मंत्री अमीन खान की माता फातिमा 106 साल की उम्र में दुरूस्त हैं।जिला प्रशासन द्धारा क्षैत्र के इन शतकवीर बुजुर्गो की उपेक्षा की जा रही हैं।जिला कलेक्टर गौरव गोयल नें बताया कि मुझे इन बुजुर्गो के बारे में जानकारी आपसे मिली हे।प्रशासन की ओर से इन्हें पूरा मान सम्मान दिया जाऐंगा।सरकारी सुविधा योग्य हैं,तों नियमानुसार लाभ दिलाया जाएगा।
कॉमन गेम्स: गज़ब खेल
प्रिंसीपल माता हरकी देवी महिला कॉलेज, औढां
कॉमनवेल्थ गेम्स में से वैल्थ तो चला गया है और अब कॉमन गेम्स रह गई हैं। वैसे सबसे कॉमन गेम यही है कि जितना हो सके मिलजुल कर वैल्थ चाट लो। अकेली अंगुली रोटी का गस्सा तक नहीं तोड़ सकती। रोटी खाने के लिये सारी अंगुलियों को इकट्ठे होना ही पड़ता है। उसी प्रकार किसी भी परियोजना या खजाने से धन लूटने के लिये सांझा कोशिश करनी पड़ती है। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। कॉमनवेल्थ गेम्स इसका ज्वलन्त प्रमाण है। अधिकरी, कर्मचारी, नेता, मंत्री, व्यवसायी, उद्योगपति, विदेशी कम्पनियां आदि सभी की मिलीभगत से करोड़ों हड़पे जा चुके हैं। देशप्रेमी लोगों का कहना है कि किसने कितना खाया या लुटाया इसका फैसला खेल होने के बाद कर लेना चाहिए। अभी देश की बदनामी हो रही है। अरे वाह! अजीब देशप्रेम है। वे यह क्यूं नहीं कहते कि जब चोर रंगे हाथों पकड़े जा रहे हैं तो उधेड़ दो उनको, खींच लो खाल। उनके हाथ में यदि इन खेलोें की डोर कुछ दिन और रह गई तो वे बचाखुचा भी निगल लेंगे और ऐसे छिद्र भी ढूंढ लेंगे जिन जिनमें से बच कर निकलने में सुविधा रहेगी। मेरे मन में तो मीडिया के लिये हार्दिक शाबाशी उमड़ रही है कि जिनके प्रयासों से कॉमनवेल्थ की सच्चाई सामने आई है। वरना आम आदमी को तो पता ही ना चलता कि किस तरह खेल-खेल में खा लिया। रही बात बदनामी की। वह तो होनी चाहिए बल्कि जिन लोगों ने खाया है, उनके नाम जगह-जगह चस्पा होने चाहिएं, ठीक वैसे ही जैसे मोस्ट वांटेड के पोस्टर्स लगाये जाते हैं या जिस तरह फर्जी यूनीवर्सिटी के नाम सभी अखबारों में छापे जाते हैं। अगर हमें देशभक्ति का परिचय देना ही है तो इन खेलों के प्रति बेरुखी दिखाकर दिया जाना चाहिए। न ही तो कोई कम्पनी इनकी प्रायोजक बने और न ही कोई नागरिक इनका दर्शक बने। काश कुर्सियां खाली पड़ी रहें और आने वाले मेहमान पूछें कि कोई आया क्यूं नहीं? और फिर आयोजक शर्म से गर्दन झुकाए खड़े रह जायें। दरअसल ये खेल नहीं रहे बल्कि तमाशा बन गए हैं। जिन लोगों ने इस तमाशे की रचना की है, उन्हें यह बता दिया जाना चाहिए कि देश की आम जनता तमाशबीन बन कर नहीं रह सकती। समय रहते उनकी डुगडुगी पकड़ कर उनके ही कानों में बजा दी जाए जो खेलों के बहाने मालामाल हो गए हैं। उनका तो खेल हो गया और देश की इज्जत तार-तार हो रही है। यदि हमारे खिलाड़ी सभी मुकाबलों के स्वर्ण पदक जीत लें तब भी यह प्रतिष्ठा वापिस नहीं आ सकती क्योंकि धोखधड़ी के खेल ने सबको पछाड़ दिया है। जब खेल चलेंगे तो आम आदमी अपनी दिहाड़ी करेगा न कि विजेताओं के लिये ताली बजाएगा। वैसे भी हर किसी को पता होना चाहिए कि मैडल से ज्यादा रोटी महत्वपूर्ण है। और यह सत्य है कि रोटी के खेल में आम आदमी बुरी तरह हार रहा है।
बाल की खाल निकालें तो अपने कॉमनवेल्थ खेलों में दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ का खेल शुरू हो गया है। लोगों ने आरटीआई के माध्यम से खेलों की तह तक गोते लगा लिये हैं। हाथ में मोती तो एक नहीं आया, हां, कोयलों की कमी नहीं है। लोग रंगे हाथों नहीं बल्कि रंगे तन-मन पकड़े जा रहे हैं। नोटों के रंग में पांव से लेकर शीश तक रंगे हैं। दीमक भी किसी पेड़ को चट करने में समय लगाती होगी पर अपने आला लोगों ने नोट चटकाने का बरसों का काम मिनटों में कर दिया। उस पर तुर्रा यह कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। आयोजक एक ही रटना लगाये जा रहे हैं कि खेल-चोरों के कारनामों की पूरी जांच होगी और कोई बख्शा नहीं जायेगा के खोखले वादे किये जा रहे हैं। चोरों को भागने का पूरा टाईम दिया जा रहा है और मौका भी। बचने-बचाने की योजनायें बन रही हैं। साथ ही जो थोड़ा बहुत पैसा बचा रह गया है, उसे हड़पने के मनसूबों में भी कमी नहीं आई है। किसी ने कहा है कि जो चोर के लिय सीढ़ी पकड़ता है वो भी चोर ही होता है। यहां तो सीढ़ी पकड़ने वालों की पूरी कतार है क्योंकि सीढ़ी पकड़ने के नाम की मोटी रकम मिलती है। संयुक्त सचिव एस. कृष्णन और संयुक्त सचिव राहुल भटनागर ने कॉमनवैल्थ खेलों के नाम पर कुल 21 विदेश यात्रायें की हैं और वे भी उन देशों की जिनका इन खेलों से कोई लेना एक ना देना दो। अब कर लो इन अधिकारियों का जिसने जो करना हो। कोई हाथ तो लगाये। एक फर्रा तक भी नहीं पकड़ाया होगा इनके हाथ में। यही तो असली खेल है कि चकमा ऐसे दो कि पकड़े भी जाओ तो पकड़ में ना आओ। यही तो आपसी मेल का खेल है। इसी कारण बड़े-बड़े डिटैक्टर भी यहां फेल हैं। दरअसल हमारे उच्च अधिकारी और राजनेता चिकन घड़े हैं। उन पर तिल भर भी असर नहीं होता। इन खेलों की कामयाबी को देश की इज्जत से जोड़ कर देखा जा रहा है। इज्जत तो तार-तार हो चुकी है। हां, कुछ मैडल आ जाएंगे तो जरूर मरहम का काम करेंगे पर इसके चांसेज कम ही नज़र आ रहे हैं। फिलहाल लग तो यह रहा है कि गड़बड़झाले के इस खेल में पता नहीं कितनों का तेल निकलेगा और किस-किस की रेल बंधेगी।
भगत सिंह: एक विचारशील क्रांतिकारी
भगत सिंह को एक महान देशभक्त के रूप में याद किया जाता है किंतु वे एक महान विचारक भी थे, यह तथ्य प्राय: गौण रहा है। वास्तव में उनके विचारों ने आजादी के सही अर्थों को रेखांकित किया। वे देश की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक क्रांति का सपना संयोए थे। वे ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जो शोषण, गरीबी, अशिक्षा, जाति-संप्रदाय-रूढि़वाद से मुक्त हो। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
भगत सिंह और उनके साथियों ने 1928 में 'हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ में 'समाजवादी शब्द जोड़कर इतिहास को एक ऐसा मोड़ देने का प्रयत्न किया था जिसे यदि तत्कालीन राजनीतिक पार्टियों का समर्थन प्राप्त हो जाता तो देश 1947में केवल राजनीतिक आजादी हासिल करके ही चुप न बैठ जाता। आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए होते। विदेशियों की गुलामी और देश की सरकार द्वारा अपनी ही जनता पर थोपी गई समाजार्थिक गुलामी में विशेष अंतर नहीं होता। दोनों हालतों में आम आदमी की स्थिति दयनीय होती है और एक बेहतर साज की परिकल्पना आकाशकुसुम बनी रहती है।
अमृतसर में अप्रैल 1928 में 'नौजवान भारत सभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया गया था। भगत सिंह सभा के महासचिव थे। प्रस्ताव में कहा गया था, '....लोगों को यह महसूस कराने की जरूरत है कि भावी क्रांति का अर्थ सिर्फ शासकों की तबदीली ही नहीं होगा। सबसे बढ़कर इसका अर्थ होगा, एक बिल्कुल नए ढांचे पर एक नए राजतंत्र की स्थापना करना। यह एक दिन या एक साल का काम नहीं है। कई दशकों के महान बलिदान ही जनता को इस महान कार्य को संपन्न करने के लिए तैयार कर सकते हैं और सिर्फ क्रांतिकारी युवकों को ही इसे करना होगा। पर यह जरूरी नहीं कि बम और पिस्तौल वाला आदमी ही क्रांतिकारी हो।
इससे दो बातें बहुत साफ हो जाती हैं-एक,क्रांति का अर्थ मात्र सत्ता परिवर्तन नहीं होता। उसका लक्ष्य एक पूरी व्यवस्था को बदलना होता है। दो,भगत सिंह आतंकवादी नहीं थे-हिंसा या बम-पिस्तौल की तुलना में वे विचार को अधिक मूल्यवान और पुरअसर समझते थे। शुरू में वे जरूर रोमांटिक क्रांतिकारी रहे लेकिन अध्ययनशीलता ने उन्हें समाजवादी क्रांतिकारी बना दिया। उन्हें यह समझते देर नहीं लगी कि क्रांति का नाटक रूमानियत के बोदे मंच पर नहीं खेला जा सकता। उसे विचार की पुख्ता धरती की जरूरत होती है।
भगत सिंह ने अपने इने-गिने वर्षों में जिंदगी और समाज के अनेक पहलुओं को गौर से उलट-पलट कर देखा। राजनीति, दर्शन, धर्म, भाषा, साहित्य, इतिहास, समाज विज्ञान आदि अनेक विषय उनके अध्ययन के केंद्र में रहे। उन्होंने न केवल इन विषयों का अध्ययन मनन किया, इन पर बहुत कुछ लिखा भी। उनका पहला लेख 'हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा 1923-24 में 'पंजाब की भाषा और लिपि विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता के लिए लिखा गया था। भगत सिंह उस समय नेशनल कॉलेज के विद्यार्थी थे। उनका लेख प्रतियोगिता के सर्वोत्तम लेखों में शुमार किया गया। लेख का सार यह था कि राष्ट्रीय भावना के विकास और देश की उन्नति के लिए साहित्य का विकास जरूरी है, परंतु साहित्य के लिए भाषा की जरूरत है। भगत सिंह ने राष्ट्र भाषा के महत्व को स्वतंत्रता से पूर्व ही समझ लिया था। स्वतंत्र भारत उसे आज तक नहीं समझ पाया। तभी विदेशियों से हमें यह सुनना पड़ता है कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। लेख में कहा गया, '.... समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और इसे एक राष्ट्र बनाना होगा। इसके लिए सर्वप्रथम एक भाषा का होना जरूरी है।
'किरती' के माह, जून 1928 के अंकों में उन्होंने 'सत्याग्रह, 'हड़तालें, 'धर्म और हमारी आजादी की जंगÓ आदि विषयों पर विचारोत्तेजक लेख लिखे। 'बम का दर्शन (जनवरी 1930), 'मैं नास्तिक क्यों हूं? (अक्तूबर 1930), 'ड्रीमलैंड की भूमिका (जनवरी 1931) उनके अन्य लेख हैं जो उन्हें क्रांतिकारी लेखक और विचारक का सम्मानित दर्जा देते हैं। इन्हीं दस्तावेजों के कारण देश के शहीदों की लंबी पंक्ति में वे बहुत कद्दावर हो उठते हैं और अलग ही दिखाई देते हैं।
भगत सिंह का चिंतन-मनन तर्क आधारित था। तर्कशीलता के कारण ही वे आस्तिक से नास्तिक बने। उन्होंने लिखा-'प्रचलित विश्वास की एक-एक बात को तर्क सहित परखना-छांटना होगा। अगर कोई तर्क के आधार पर किसी सिद्धांत या आदर्श में विश्वास करने लगता है तो उसका विश्वास सराहनीय है। सिर्फ विश्वास और अंधविश्वास खतरनाक है, ये दिमाग को कुंद बना देते हैं।....मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रकृति को चलाने वाली परमात्मा जैसी कोई सजग सत्ता नहीं। हमारा प्रकृति पर विश्वास है और समुचित प्रगति का लक्ष्य मनुष्य का प्रकृति के ऊपर अपनी सेवा के लिए कब्जा करना है। इसके पीछे कोई सजग चालक शक्ति नहीं है।
भगत सिंह के समकालीन कांग्रेसी तथा वाम विचारधारा के नेता उनके जीवनकाल में उन्हें नहीं समझ पाए। आज भी 28 सितंबर को उनकी जयंती और 23 मार्च को उनकी शहादत की रस्म अदायगी के अलावा वे भगत सिंह के प्रति गंभीर नहीं होते। उनकी नजर से समस्याओं को नहीं देखते, उन्हें हल करने की दिशा में कदम उठाना तो दूर की बात है। हालांकि भाषा, सांप्रदायिकता, समाजिक रूढि़वाद, धार्मिक कठमुल्लापन जैसी समस्याएं आज भी उतनी जटिल हैं और गंभीर, जितनी भगत सिंह के समय में थीं। माना कि क्रांति का तत्कालीन मूल मंत्र माक्र्सवाद जिसमें भगत सिंह को पूर्ण आस्था थी आज विश्व रंगमंच के नेपथ्य में चला गया है। उसकी वापसी यदि हुई तो उसमें से बहुत कुछ थोथा उड़ चुका होगा जो माक्र्सवाद के स्वरुप को बिगाडऩे का मुख्य कारक रहा। सारहीन वस्तु को न इतिहास ग्राह्य समझता है, न कुदरत उसे संजो कर रख सकती है। लेकिन ऊपर कहे गए अनेक मुद्दों के हल के लिए भगत सिंह आज भी प्रासंगिक जान पड़ते हैं। किसी चमत्कार को उनके साथ जोड़े बिना कहा जा सकता है कि वे भविष्यदृष्टा भी थे। फांसी से पहले अपनी अंतिम भेंट में उन्होंने कहा था: 'अंग्रेज की जड़ें हिल चुकी है , वे पंद्रह साल में चले जाएंगे, समझौता हो जाएगा। पर उससे जनता का कोई लाभ नहीं होगा। काफी साल अफरातफरी में बीतेंगे। उसके बाद लोगों को मेरी याद आएगी।
उनकी भविष्यवाणी का एक-एक शब्द सही निकला। सही यह भी है कि भगत सिंह को भावना के स्तर पर याद करके हम निश्चिंत-निष्क्रिय हो उठते हैं जबकि जरूरत है विचार के धरातल पर मंथन की, अमल की। देखें समय की शिला पर भगत सिंह का नाम फिर से कौन उकेरेगा?
Sunday, September 5, 2010
हर पेट को रोटी, बाकी सब बात खोटी-चौधरी देवीलाल
चौधरी देवीलाल अक्सर कहा करते थे कि गांव व ग्रामीण आंचल में बसने वाले विशेषकर किसान, मजदूर व खेती पर निर्भर लोगों को खुशहाल बना दो तो देश अपने आप खुशहाल हो जाएगा। उनका कहना था कि अगर किसान, मजदूर व कमेरे वर्ग के पास खुशहाली आएगी तो वह शहर में जाकर ज्यादा सामान खरीदेगा जिससे छोटा-बड़ा हर दुकानदार खुशहाल हो जाएगा और दुकानदार के खुशहाल होते ही उद्योग धन्धे भी सफल होने लगेंगे। आज उनकी कही हुई बातें एकदम स्टीक व जीवन का निचोड़ नजर आती हैं। चौधरी देवीलाल की आत्मा देहात में रची-बसी हुई थी इसलिए वो अक्सर कहा करते थे कि भारत गांवों का देश है देश की आत्मा का निवास तो देहात में है। जब तक गाँवों व छोटे कस्बों में रहने वाली जनता को ऊपर नहीं उठाएंगे उनकी आर्थिक और सामाजिक हालात में बदलाव नहीं लाएंगे, तब तक देश व प्रदेश में खुशहाली नहीं आएगी। जब तक गाँवों व छोटे कस्बों में सारी बुनियादी सुविधाएं नहीं जुटाई जाएंगी जिनकी एक व्यक्ति को आवश्यकता है तब तक सही मायनों में न तो भारत आर्थिक रूप से सम्पन्न हो सकता है और न ही देशवासी सही मायनों में खुशहाल हो सकते हैं। इसलिए वे अक्सर कहा करते थे कि-
हर खेत को पानी, हर हाथ को काम।
हर तन को कपड़ा, हर सर को मकान।
हर पेट को रोटी, बाकी सब बात खोटी।
चौ. देवीलाल ने 25 सितम्बर, 1914 को एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लिया और पले व बढ़़े, लेकिन वे उन बुराइयों और कमजोरियों से बचे रहे जो इस प्रकार के माहौल में पलने वालों में साधारणतया आ जाती है। इसका कारण बना कुछ उनका स्वभाव और कुछ सामयिक परिस्थितियां, जिसे व्यक्ति विशेष की विशिष्टता कहा जा सकता है। जब वे छोटी अवस्था में थे तो उनकी मां का देहांत हो गया। परिणामस्वरूप बचपन में ही दादा जी अंतर्मुखी होते चले गए। उन्हें अपने निर्णय खुद ही लेने के लिए अपने आपको तैयार करना पड़ा। गलत-सही जो भी निर्णय उन्हें करने पड़ते थे वह अपने मन से करते थे या फिर गांव तथा स्कूल के उन साथियों की देखादेखी जो उन्हें अपने दिल के करीब लगते थे। इसी के चलते वे छोटे किसानों, मुजारों और निर्धन परिवारों से आने वाले संगी-साथियों के करीब आते गए। बड़े जमींदारों के बच्चे अच्छे कपड़े-लत्ते और जूते पहन कर स्कूल जाया करते थे। साधारण परिवारों के बच्चे आमतौर पर बिना जूतों के, नंगे पैर ही स्कूल जाते थे। मेरे दादा जी भी अपने जूते स्कूल के रास्ते किसी झाड़ी या पत्थर के नीचे छिपा कर नंगे पैर स्कूल जाते थे। इस प्रकार उनका मेलजोल जमींदार परिवारों के बच्चों की बजाय निर्धन किसानों और मुजारों-काश्तकारों के बच्चों के साथ बढ़ता चला गया। यही झुकाव आगे चलकर देवीलाल को बड़े किसानों और जमींदारों के विरुद्ध मुजारों और किसानों के हकों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा का सबब बना। पांचवी कक्षा के बाद वे डबवाली, फिरोजपुर और मोगा के स्कूलों में पढ़े। छात्रावासों के स्वावलंबी जीवन ने उनमें आत्मविश्वास और साथ ही जुझारूपन भी भर दिया था। आधुनिक खेलकूद की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी लेकिन अखाड़े में कुश्ती लडऩे का शौक लग गया। इस शौक के लिए उन्हें कभी-कभी छात्रावास का अनुशासन भी भंग करना पड़ता था और उसकी सजा के रूप में जुर्माना आदि भी भरना पड़ता था। छात्रावासों में उस समय सबसे बड़ी पाबंदी थी क्रांतिकारी साहित्य पढऩे की और देवीलाल को उसी का चस्का लग गया। वे अक्सर बताया करते थे कि 'छात्रावास में रहते हुए देशभक्ति का साहित्य पढऩा वर्जित था, देशभक्तों के चरित्र पर बहस करने की सख्त मनाही थी। राष्ट्र-प्रेमी संस्थाओं की सदस्यता लेना और साम्राज्यवाद विरोधी सार्वजनिक सभाओं में भाग लेना सर्वथा निषिद्ध था।Ó दादा जी जब छात्रावास में विभिन्न विचारों के अध्यापकों और विद्यार्थियों के सम्पर्क में आए तो उनका झुकाव अंग्रेज सरकार के खिलाफ छपने वाले साहित्य की ओर बढ़ा। राष्ट्रपे्रम की खबरों वाले अखबारों को छात्रावास में छिप-छिपकर पढ़ा जाने लगा। एक दिन पकड़े गए और छात्रावास से निकाल दिए गए। उनके साथ उनके दो-तीन और साथी भी निकाले गए। घर वालों को पता चलता तो और मुसीबत खड़ी होती इसलिए साथियों के साथ कमरा किराए पर लेकर वहीं बाहर रहने लगे और पढ़ाई जारी रखी।
वे मोगा के स्कूल में दसवीं कक्षा में थे कि आजादी की जंग ने नया मोड़ ले लिया। सन् 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें पूर्ण आजादी की मांग की गई। दादा जी अपने कुछ साथियों के साथ स्वयंसेवक के रूप में शामिल हुए। सन् 1926 में ही डबवाली के स्कूल में पढ़ते हुए वे 'शेरे पंजाबÓ लाला लाजपत राय के प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। नवंबर, 1928 में जब लाला लाजपत राय की पुलिस की लाठियों के प्रहार के कारण मृत्यु हो गई तो वे भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित होने लगे। मोगा के स्कूल में पढ़ते हुए एक दिन उन्हें पता चला कि पंडित मदन मोहन मालवीय लुधियाना आ रहे हैं। वे अपने साथियों के साथ उनका भाषण सुनने लुधियाना पहुंच गए। वहां उन्हें पता चला कि मालवीय जी का भाषण अमृतसर में होगा तो वे अमृतसर पहुंच गए। लेकिन उनके वहां पहुंचने से पहले ही मालवीय जी का भाषण हो चुका था और काजी अब्दुल रहमान का भाषण हो रहा था। भाषण समाप्त होते ही पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन देवीलाल और उनके साथियों का जोश उस देशभक्ति पूर्ण माहौल को देखकर प्रबल हो गया। वे कांग्रेस के स्वयंसेवक के रूप में भर्ती होकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने लगे और देश की आजादी के लिए अनेक बार जेल गए।
दादा जी देश के उप-प्रधानमन्त्री और हरियाणा के मुख्यमन्त्री सहित अनेक प्रमुख पदों पर रहे लेकिन उनके मन में कभी किसी बड़े से बड़े पद का भी मोह नहीं था। 1989 में देवीलाल को सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री पद के लिए चुन लिया गया और उन्होंने यह पद वीपी सिंह को सौंपकर खुद उप-प्रधानमंत्री बनना स्वीकार किया जिसके चलते चौधरी देवीलाल की छवि आज भी लाखों-करोड़ों लोगों के मन में बसी हुई है। हरियाणा के ताऊ सारे भारत के ताऊ बन गए हैं। उनकी जीवन-यात्रा निरंतर संघर्ष और विद्रोह की कथा रही है जो आने वाली पीढिय़ों के लिए लंबे समय तक प्रेरणा-स्त्रोत बनी रहेगी। भारतीय राजनीति को कल्याण का स्वरूप प्रदान कर ग्रामीण जन चेतना के संवाहक के रूप में मेरे दादा चौ. देवी लाल ने ग्रामीण समाज विशेषकर किसान, मजदूर, गरीब व दबे-कुचले लोगों में जन-चेतना जगाकर उसको अपने अधिकारों व उसकी रक्षा के प्रति सचेत करते हुए अधिकार पाने के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया।
आज उनकी नौवीं पुण्य तिथि है और वे चाहे शरीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके ऊंचे आदर्श व जीवनमूल्य हमारे लिए पथ प्रदर्शक के रूप में हमें जीवन की सही राह दिखाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने मुझे ही नहीं अपितु भारत-भर के हजारों नेताओं को उंगली पकड़कर राजनीति में चलना सिखाया। उनकी आत्मा आम लोगों, ग्रामीण समाज व छोटे कस्बों में रहने वाले कमरे वर्ग में बसती है। उनका जीवन दर्शन उनकी सोच एवं नीतियों के माध्यम से सर्वहारा वर्ग का उत्थान नितान्त आवश्यक है। महात्मा गांधी, सर छोटू राम, चौ. देवीलाल, चौ. चरण सिंह सरीखे नेताओं ने अपनी राजनीति के सफर का रास्ता गांवों के माध्यम से तय किया। इसलिए वो कहा करते थे- 'भारत की सुख एवं समृद्धि का रास्ता गांवों से होकर गुजरता है।इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि आजादी के 63 वर्ष बाद भी देश के गांवों व छोटे कस्बों में बिजली, पानी, स्वास्थ्य व स्कूलों की सुविधाएं आशानुरूप नहीं है। जब तक गांवों व छोटे कस्बों का विकास नहीं होगा, भारत के विकास की परिकल्पना नहीं की जा सकती। उनकी पुण्य तिथि पर उनके दिखाए गए रास्ते पर चलकर ही हम जगत् 'ताऊÓ चौ. देवीलाल को सच्ची श्रद्धांजति दे सकते हैं।
- अजय सिंह चौटाला
हर खेत को पानी, हर हाथ को काम।
हर तन को कपड़ा, हर सर को मकान।
हर पेट को रोटी, बाकी सब बात खोटी।
चौ. देवीलाल ने 25 सितम्बर, 1914 को एक समृद्ध जमींदार परिवार में जन्म लिया और पले व बढ़़े, लेकिन वे उन बुराइयों और कमजोरियों से बचे रहे जो इस प्रकार के माहौल में पलने वालों में साधारणतया आ जाती है। इसका कारण बना कुछ उनका स्वभाव और कुछ सामयिक परिस्थितियां, जिसे व्यक्ति विशेष की विशिष्टता कहा जा सकता है। जब वे छोटी अवस्था में थे तो उनकी मां का देहांत हो गया। परिणामस्वरूप बचपन में ही दादा जी अंतर्मुखी होते चले गए। उन्हें अपने निर्णय खुद ही लेने के लिए अपने आपको तैयार करना पड़ा। गलत-सही जो भी निर्णय उन्हें करने पड़ते थे वह अपने मन से करते थे या फिर गांव तथा स्कूल के उन साथियों की देखादेखी जो उन्हें अपने दिल के करीब लगते थे। इसी के चलते वे छोटे किसानों, मुजारों और निर्धन परिवारों से आने वाले संगी-साथियों के करीब आते गए। बड़े जमींदारों के बच्चे अच्छे कपड़े-लत्ते और जूते पहन कर स्कूल जाया करते थे। साधारण परिवारों के बच्चे आमतौर पर बिना जूतों के, नंगे पैर ही स्कूल जाते थे। मेरे दादा जी भी अपने जूते स्कूल के रास्ते किसी झाड़ी या पत्थर के नीचे छिपा कर नंगे पैर स्कूल जाते थे। इस प्रकार उनका मेलजोल जमींदार परिवारों के बच्चों की बजाय निर्धन किसानों और मुजारों-काश्तकारों के बच्चों के साथ बढ़ता चला गया। यही झुकाव आगे चलकर देवीलाल को बड़े किसानों और जमींदारों के विरुद्ध मुजारों और किसानों के हकों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा का सबब बना। पांचवी कक्षा के बाद वे डबवाली, फिरोजपुर और मोगा के स्कूलों में पढ़े। छात्रावासों के स्वावलंबी जीवन ने उनमें आत्मविश्वास और साथ ही जुझारूपन भी भर दिया था। आधुनिक खेलकूद की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी लेकिन अखाड़े में कुश्ती लडऩे का शौक लग गया। इस शौक के लिए उन्हें कभी-कभी छात्रावास का अनुशासन भी भंग करना पड़ता था और उसकी सजा के रूप में जुर्माना आदि भी भरना पड़ता था। छात्रावासों में उस समय सबसे बड़ी पाबंदी थी क्रांतिकारी साहित्य पढऩे की और देवीलाल को उसी का चस्का लग गया। वे अक्सर बताया करते थे कि 'छात्रावास में रहते हुए देशभक्ति का साहित्य पढऩा वर्जित था, देशभक्तों के चरित्र पर बहस करने की सख्त मनाही थी। राष्ट्र-प्रेमी संस्थाओं की सदस्यता लेना और साम्राज्यवाद विरोधी सार्वजनिक सभाओं में भाग लेना सर्वथा निषिद्ध था।Ó दादा जी जब छात्रावास में विभिन्न विचारों के अध्यापकों और विद्यार्थियों के सम्पर्क में आए तो उनका झुकाव अंग्रेज सरकार के खिलाफ छपने वाले साहित्य की ओर बढ़ा। राष्ट्रपे्रम की खबरों वाले अखबारों को छात्रावास में छिप-छिपकर पढ़ा जाने लगा। एक दिन पकड़े गए और छात्रावास से निकाल दिए गए। उनके साथ उनके दो-तीन और साथी भी निकाले गए। घर वालों को पता चलता तो और मुसीबत खड़ी होती इसलिए साथियों के साथ कमरा किराए पर लेकर वहीं बाहर रहने लगे और पढ़ाई जारी रखी।
वे मोगा के स्कूल में दसवीं कक्षा में थे कि आजादी की जंग ने नया मोड़ ले लिया। सन् 1929 में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ जिसमें पूर्ण आजादी की मांग की गई। दादा जी अपने कुछ साथियों के साथ स्वयंसेवक के रूप में शामिल हुए। सन् 1926 में ही डबवाली के स्कूल में पढ़ते हुए वे 'शेरे पंजाबÓ लाला लाजपत राय के प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। नवंबर, 1928 में जब लाला लाजपत राय की पुलिस की लाठियों के प्रहार के कारण मृत्यु हो गई तो वे भगत सिंह और उनके साथियों की क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित होने लगे। मोगा के स्कूल में पढ़ते हुए एक दिन उन्हें पता चला कि पंडित मदन मोहन मालवीय लुधियाना आ रहे हैं। वे अपने साथियों के साथ उनका भाषण सुनने लुधियाना पहुंच गए। वहां उन्हें पता चला कि मालवीय जी का भाषण अमृतसर में होगा तो वे अमृतसर पहुंच गए। लेकिन उनके वहां पहुंचने से पहले ही मालवीय जी का भाषण हो चुका था और काजी अब्दुल रहमान का भाषण हो रहा था। भाषण समाप्त होते ही पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन देवीलाल और उनके साथियों का जोश उस देशभक्ति पूर्ण माहौल को देखकर प्रबल हो गया। वे कांग्रेस के स्वयंसेवक के रूप में भर्ती होकर स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लेने लगे और देश की आजादी के लिए अनेक बार जेल गए।
दादा जी देश के उप-प्रधानमन्त्री और हरियाणा के मुख्यमन्त्री सहित अनेक प्रमुख पदों पर रहे लेकिन उनके मन में कभी किसी बड़े से बड़े पद का भी मोह नहीं था। 1989 में देवीलाल को सर्वसम्मति से प्रधानमंत्री पद के लिए चुन लिया गया और उन्होंने यह पद वीपी सिंह को सौंपकर खुद उप-प्रधानमंत्री बनना स्वीकार किया जिसके चलते चौधरी देवीलाल की छवि आज भी लाखों-करोड़ों लोगों के मन में बसी हुई है। हरियाणा के ताऊ सारे भारत के ताऊ बन गए हैं। उनकी जीवन-यात्रा निरंतर संघर्ष और विद्रोह की कथा रही है जो आने वाली पीढिय़ों के लिए लंबे समय तक प्रेरणा-स्त्रोत बनी रहेगी। भारतीय राजनीति को कल्याण का स्वरूप प्रदान कर ग्रामीण जन चेतना के संवाहक के रूप में मेरे दादा चौ. देवी लाल ने ग्रामीण समाज विशेषकर किसान, मजदूर, गरीब व दबे-कुचले लोगों में जन-चेतना जगाकर उसको अपने अधिकारों व उसकी रक्षा के प्रति सचेत करते हुए अधिकार पाने के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाया।
आज उनकी नौवीं पुण्य तिथि है और वे चाहे शरीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके ऊंचे आदर्श व जीवनमूल्य हमारे लिए पथ प्रदर्शक के रूप में हमें जीवन की सही राह दिखाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने मुझे ही नहीं अपितु भारत-भर के हजारों नेताओं को उंगली पकड़कर राजनीति में चलना सिखाया। उनकी आत्मा आम लोगों, ग्रामीण समाज व छोटे कस्बों में रहने वाले कमरे वर्ग में बसती है। उनका जीवन दर्शन उनकी सोच एवं नीतियों के माध्यम से सर्वहारा वर्ग का उत्थान नितान्त आवश्यक है। महात्मा गांधी, सर छोटू राम, चौ. देवीलाल, चौ. चरण सिंह सरीखे नेताओं ने अपनी राजनीति के सफर का रास्ता गांवों के माध्यम से तय किया। इसलिए वो कहा करते थे- 'भारत की सुख एवं समृद्धि का रास्ता गांवों से होकर गुजरता है।इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि आजादी के 63 वर्ष बाद भी देश के गांवों व छोटे कस्बों में बिजली, पानी, स्वास्थ्य व स्कूलों की सुविधाएं आशानुरूप नहीं है। जब तक गांवों व छोटे कस्बों का विकास नहीं होगा, भारत के विकास की परिकल्पना नहीं की जा सकती। उनकी पुण्य तिथि पर उनके दिखाए गए रास्ते पर चलकर ही हम जगत् 'ताऊÓ चौ. देवीलाल को सच्ची श्रद्धांजति दे सकते हैं।
- अजय सिंह चौटाला
आध्यात्मिक विरासत और धर्म का खजाना हैं सिरसा
हरियाणा प्रदेश के एक छोर पर बसे सिरसा जिला की आध्यात्मिक विरासत और धर्म का खजाना देशभर में ख्यात है। हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की त्रिवेणी कहलाने वाला यह शहर धनाढय़ लोगों का निवास स्थान है। धन-धान्य की कमी न होने के चलते ही यहां धर्म का प्रचार भी खूब फला-फूला और अनेक ऋषि-मुनियों और मनीषियों-महापुरुषों ने इस शहर को अपनी कर्मभूमि बनाया। सिरसा के संस्थापक कहलाने वाले श्री श्री 1008 बाबा सरसाईं नाथ की बात करें या फिर सच्चा सौदा के संस्थापक बेपरवाह मस्ताना शाह की, धर्म और अध्यात्म की गंगा यहां सदैव बहती रही है।
सिरसा में डेरा सच्चा सौदा, राधास्वामी सत्संग ब्यास का आश्रम, संत निरंकारी भवन के स्थापित आश्रम हैं वहीं पीर-फकीरों की अनेक दरगाहों और डेरों का यहां बाहुल्य है। बाबा श्योराम दास, बाबा बिहारी जी और बाबा तारा जी की यहां काफी मान्यता है और इन महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त करने वाले लोगों ने जीवन की सफलता के मार्ग भी तय किए हैं। बाबा तारा जी ने इस इलाके को अपनी तपोभूमि बनाया और अपना चोला बदलने के लिए हरि की भूमि हरिद्वार को चुना। साथ ही शिवरात्रि के दिन उनका देहावसान हुआ।
पंजाब एवं राजस्थान की सीमा के साथ लगते इस शहर की सभ्यता को अपने बीच समेटे हुए सिरसा के रानियां रोड पर ब्रह्मलीन हुए शिवभक्त सद्गुरू श्री बाबा तारा जी की लंबे समय तक तपोभूमि रही सिरसा को एक महान तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया गया है। बेशक इस तपोभूमि को कुटिया कहते हैं लेकिन इसके वैभवशाली इतिहास और गौरवान्वित करते नक्श को देखते हुए इसे आधुनिक और प्राचीन स्थापत्य कला का नमूना कहा जा सकता है जिसके विकास के लिए प्रमुख समाजसेवी एवं हरियाणा सरकार में गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा व उनके अनुज गोविंद कांडा ने अथक प्रयास और मेहनत की है। उन्हीं की देखरेख में इस कुटिया में अहर्निश तेजी से विकास कार्य चल रहे हैं। कहना न होगा कि निकट भविष्य में यह कुटिया एक बहुत बड़े तीर्थ के रूप में अपना अस्तित्व कायम कर लेगी।
बाबा तारा कुटिया पर प्रतिदिन न केवल सिरसा बल्कि दूरदराज से हजारों श्रद्धालु आकर बाबा तारा की कुटिया पर शीश झुकाते हैं और मन्नतें मानते हैं। अब तक लाखों लोग इस कुटिया पर आ चुके हैं। बाबा तारा ने फाल्गुन माह की शिवरात्रि के दिन हिसार जिले के हांसी तहसील में पड़ते गांव पाली में श्रीचंद सैनी के घर जन्म लिया था। बाबा तारा की दो वर्ष की आयु में उनके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। इसके बाद उनका पालन पोषण उनकी बुआ व फूफा जी ने गांव रामनगरिया में किया। बचपन से ही बाबा तारा शिवभक्ति में लीन रहते थे।
जब उनकी अवस्था 15-16 वर्ष की थी तो परिजनों ने उनके विवाह की तैयारी की लेकिन तभी बाबा ने सांसारिक मोह त्याग दिया और सिरसा में सिद्ध बाबा बिहारी की सेवा करनी आरंभ की। उनके मार्गदर्शन में घोर तपस्या करते हुए बाबा बिहारी के आदेशानुसार उनके शिष्य सिद्ध बाबा श्योराम जी से नाम की दीक्षा ली। इसके बाद सिरसा छोड़ हिसार के घने जंगलों में घोर तपस्या की। इसी दौरान उनके सेवकों ने उनसे मिलकर सिरसा आने की प्रार्थना की। उनके प्रेमपूर्ण निवेदन को स्वीकारते हुए बाबा तारा ने रामनगरिया गांव के पास जंगल में कुटिया बनाकर इसे अपनी साधना, तप, शिवभक्ति और सद्कर्म से तपोभूमि में परिवर्तित कर दिया। ब्रह्मचारी संत के रूप में ख्यात हुए एकांतप्रिय बाबा तारा शिवभक्ति को अत्यधिक महत्व देते थे। रात्रिकाल में भी उनकी कुटिया में कोई सेवक नहीं रहता था क्योंकि उनकी धारणा थी कि शिवभक्तों की रक्षा भगवान शिव स्वयं करते हैं। बाबा की सादगी का परिचय इसी से मिलता है कि वे अपना निर्वाह 24 घंटे में मात्र एक समय रोटी व लाल मिर्च की चटनी से ही करते थे। लंबे समय तक मौन धारण करते हुए बाबा ने 12 वर्ष तक बिना अन्न के शिव की तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की। जिस भी श्रद्धालु ने इस तपोभूमि को नमन किया उसका जीवन सफल हो गया।
हर वर्ष फाल्गुन और सावन माह में शिवरात्रि पर्व के अवसर पर बाबा तारा जी शिवधाम, नीलकंठ, महादेव, हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, नीलधारा, रामेश्वरम, अमरनाथ, उज्जैन के अतिरिक्त भगवान शिव के पूजनीय स्थलों ज्योतिर्लिंगों की उपमा के साथ कुछ सेवकों के साथ यात्रा करते थे। वर्ष 2003 को 20 जुलाई के दिन शिवरात्रि के पर्व पर बाबा तारा अपने सेवकों सहित हरिद्वार पहुंचे जहां 26 जुलाई को गंगाघाट आश्रम में परमानंद आश्रम में गए। अपने सेवकों को भोजन करवाने के बाद शिवरात्रि की पावन बेला शुरू होते ही वे अपने कमरे से बाहर आकर गंगाघाट पहुंच गए और वहां स्थापित शिवालय के निकट उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। कुटिया के प्रमुख सेवक गोपाल कांडा कहते हैं कि वे सब यह देखकर चकित थे कि इस महान संत ने शिव में अंतर्लीन होने के लिए पावन मुहूर्त व पावन गंगा घाट का चयन किया। बाबा की कुटिया में 71 फुट ऊंचा शिवालय आकर्षण का केंद्र है। शिवलिंग के आकार में ही बनाए गए इस शिवालय की सीढिय़ां धोलपुर पत्थर से बनी हैं जिन पर की गई नक्काशी देखने लायक है। शिवालय में दाखिल होते ही कारीगरों द्वारा तराशकर लगाए गए शीशे व शिवालय में चांदी पर की गई मीनाकारी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
शिवालय में स्थापित किया गया शिवलिंग महाराजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन से लाया गया है। इस शिवलिंग की पूजा अर्चना के लिए काशी से लाए गए विद्वान ज्योतिषाचार्य पंडित घनश्याम शर्मा की देखरेख में प्रतिदिन रूद्राभिषेक, शिवमहिमा स्तोत्र, शिव तांडव, शुक्ल यजुर्वेद का पाठ, दुर्गा सप्तशती व आरती की जाती है। शिवालय व नंदी जी के सामने निर्मित की गई मनमोहक भगवान शिव की प्रतिमा अपने आपमें ऐतिहासिक है। 35 फुट लंबे व 35 फुट चौड़े प्लेटफार्म पर स्थापित 108 फुट ऊंची शिव प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा है। मात्र सवा साल में 600 टन की इस प्रतिमा का निर्माण पिलानी के प्रसिद्ध मूर्तिकार मातूराम द्वारा किया गया। इस पर तांबे की पॉलिश की गई व इस मूर्ति के तिलक, नाभि, कुंडल, कड़ों को सोने की चादर से बनाया गया है। प्रतिमा की जटों से गंगा अवतरण का दृश्य इसके रूप को चार चांद लगाता प्रतीत होता है। सायंकाल को विद्युत किरणों व उषाकाल के सूर्योदय के समय गंगा अवतरण से होने वाली जलधारा देखने योग्य है। इस प्रतिमा के ठीक सामने इटली की तकनीक के सहयोग से दिल्ली के विशेषज्ञों द्वारा ऊं नमो शिवाय: शब्द पर आधारित फव्वारा दूरदराज तक के लोगों के लिए एक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करता है।
बाबा तारा की कुटिया परिसर में 5 हजार फुट लंबी तैयार की गई कृत्रिम गुफा के मुख पर हनुमान जी विराजमान किए गए हैं। गुफा के भीतर जंगल के प्राकृतिक दृश्यों के बीच ब्रह्मलीन बाबा तारा जी के जीवन से संबंधित झांकियां बनाई गई हैं। इसके अलावा गुफा के भीतर बाबा अमरनाथ के हिम शिवलिंग, कैलाश पर्वत, 12 ज्योतिर्लिंग आदि के कृत्रिम दृश्य व गुफा के दूसरे छोर के बाहर समुद्र मंथन का दृश्य यहां आने वाले पर्यटकों को आत्मविभोर कर देते हैं। बाबा तारा की कुटिया लगभग 20 एकड़ में विकसित की गई है जिसमें श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु स्वचालित 140 किलोवाट व 125 किलोवाट के 5 जनरेट स्थापित किए गए हैं। कुटिया में लोगों के इलाज के लिए एक नि:शुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सालय का भी संचालन किया जा रहा है जहां उच्च स्तर की कंपनियों की दवाइयों से जरूरतमंद मरीजों का उपचार किया जाता है। कुटिया प्रांगण में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एक विशाल शैड का निर्माण भी किया गया है। कुटिया समिति द्वारा शहर के विभिन्न चौराहों से मात्र एक घंटे के अंतराल में वाहन सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है।
कुटिया में आने वाले श्रद्धालुओं को नाममात्र कीमत पर देसी घी से निर्मित दोपहर भोज की व्यवस्था भी की जाती है। भोजन के लिए वातानुकूलित हट्स भी स्थापित किए गए हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के झूलों की भी व्यवस्था है। बाबा तारा कुटिया में अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर की भी शुरूआत की गई है जिसमें हजारों लोगों की आंखों का उपचार व ऑप्रेशन किया जा चुका है। बाबा तारा के तीसरे निर्वाण दिवस के अवसर पर कुटिया में अतिरूद्र महायज्ञ 251 वेदपाठियों द्वारा किया गया था जो रावण के काल के उपरांत पहली बार हुआ। कुटिया में देशभर के ख्याति प्राप्त साधु महात्मा भी लगातार आध्यात्मिक गंगा बहाने के लिए समय-समय पर आते रहते हैं। इसके अलावा अनेक फिल्मी हस्तियां व गायकों ने इस तपोभूमि पर अपनी कला का जलवा बिखेरा है। दिन प्रतिदिन इस कुटिया में विकास कार्य तेजी से करवाए जा रहे हैं जिससे आने वाले एकाध वर्ष में ही कुटिया अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करेगी।
सिरसा में डेरा सच्चा सौदा, राधास्वामी सत्संग ब्यास का आश्रम, संत निरंकारी भवन के स्थापित आश्रम हैं वहीं पीर-फकीरों की अनेक दरगाहों और डेरों का यहां बाहुल्य है। बाबा श्योराम दास, बाबा बिहारी जी और बाबा तारा जी की यहां काफी मान्यता है और इन महापुरुषों का सान्निध्य प्राप्त करने वाले लोगों ने जीवन की सफलता के मार्ग भी तय किए हैं। बाबा तारा जी ने इस इलाके को अपनी तपोभूमि बनाया और अपना चोला बदलने के लिए हरि की भूमि हरिद्वार को चुना। साथ ही शिवरात्रि के दिन उनका देहावसान हुआ।
पंजाब एवं राजस्थान की सीमा के साथ लगते इस शहर की सभ्यता को अपने बीच समेटे हुए सिरसा के रानियां रोड पर ब्रह्मलीन हुए शिवभक्त सद्गुरू श्री बाबा तारा जी की लंबे समय तक तपोभूमि रही सिरसा को एक महान तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया गया है। बेशक इस तपोभूमि को कुटिया कहते हैं लेकिन इसके वैभवशाली इतिहास और गौरवान्वित करते नक्श को देखते हुए इसे आधुनिक और प्राचीन स्थापत्य कला का नमूना कहा जा सकता है जिसके विकास के लिए प्रमुख समाजसेवी एवं हरियाणा सरकार में गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा व उनके अनुज गोविंद कांडा ने अथक प्रयास और मेहनत की है। उन्हीं की देखरेख में इस कुटिया में अहर्निश तेजी से विकास कार्य चल रहे हैं। कहना न होगा कि निकट भविष्य में यह कुटिया एक बहुत बड़े तीर्थ के रूप में अपना अस्तित्व कायम कर लेगी।
बाबा तारा कुटिया पर प्रतिदिन न केवल सिरसा बल्कि दूरदराज से हजारों श्रद्धालु आकर बाबा तारा की कुटिया पर शीश झुकाते हैं और मन्नतें मानते हैं। अब तक लाखों लोग इस कुटिया पर आ चुके हैं। बाबा तारा ने फाल्गुन माह की शिवरात्रि के दिन हिसार जिले के हांसी तहसील में पड़ते गांव पाली में श्रीचंद सैनी के घर जन्म लिया था। बाबा तारा की दो वर्ष की आयु में उनके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। इसके बाद उनका पालन पोषण उनकी बुआ व फूफा जी ने गांव रामनगरिया में किया। बचपन से ही बाबा तारा शिवभक्ति में लीन रहते थे।
जब उनकी अवस्था 15-16 वर्ष की थी तो परिजनों ने उनके विवाह की तैयारी की लेकिन तभी बाबा ने सांसारिक मोह त्याग दिया और सिरसा में सिद्ध बाबा बिहारी की सेवा करनी आरंभ की। उनके मार्गदर्शन में घोर तपस्या करते हुए बाबा बिहारी के आदेशानुसार उनके शिष्य सिद्ध बाबा श्योराम जी से नाम की दीक्षा ली। इसके बाद सिरसा छोड़ हिसार के घने जंगलों में घोर तपस्या की। इसी दौरान उनके सेवकों ने उनसे मिलकर सिरसा आने की प्रार्थना की। उनके प्रेमपूर्ण निवेदन को स्वीकारते हुए बाबा तारा ने रामनगरिया गांव के पास जंगल में कुटिया बनाकर इसे अपनी साधना, तप, शिवभक्ति और सद्कर्म से तपोभूमि में परिवर्तित कर दिया। ब्रह्मचारी संत के रूप में ख्यात हुए एकांतप्रिय बाबा तारा शिवभक्ति को अत्यधिक महत्व देते थे। रात्रिकाल में भी उनकी कुटिया में कोई सेवक नहीं रहता था क्योंकि उनकी धारणा थी कि शिवभक्तों की रक्षा भगवान शिव स्वयं करते हैं। बाबा की सादगी का परिचय इसी से मिलता है कि वे अपना निर्वाह 24 घंटे में मात्र एक समय रोटी व लाल मिर्च की चटनी से ही करते थे। लंबे समय तक मौन धारण करते हुए बाबा ने 12 वर्ष तक बिना अन्न के शिव की तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की। जिस भी श्रद्धालु ने इस तपोभूमि को नमन किया उसका जीवन सफल हो गया।
हर वर्ष फाल्गुन और सावन माह में शिवरात्रि पर्व के अवसर पर बाबा तारा जी शिवधाम, नीलकंठ, महादेव, हरिद्वार, बद्रीनाथ, केदारनाथ, नीलधारा, रामेश्वरम, अमरनाथ, उज्जैन के अतिरिक्त भगवान शिव के पूजनीय स्थलों ज्योतिर्लिंगों की उपमा के साथ कुछ सेवकों के साथ यात्रा करते थे। वर्ष 2003 को 20 जुलाई के दिन शिवरात्रि के पर्व पर बाबा तारा अपने सेवकों सहित हरिद्वार पहुंचे जहां 26 जुलाई को गंगाघाट आश्रम में परमानंद आश्रम में गए। अपने सेवकों को भोजन करवाने के बाद शिवरात्रि की पावन बेला शुरू होते ही वे अपने कमरे से बाहर आकर गंगाघाट पहुंच गए और वहां स्थापित शिवालय के निकट उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। कुटिया के प्रमुख सेवक गोपाल कांडा कहते हैं कि वे सब यह देखकर चकित थे कि इस महान संत ने शिव में अंतर्लीन होने के लिए पावन मुहूर्त व पावन गंगा घाट का चयन किया। बाबा की कुटिया में 71 फुट ऊंचा शिवालय आकर्षण का केंद्र है। शिवलिंग के आकार में ही बनाए गए इस शिवालय की सीढिय़ां धोलपुर पत्थर से बनी हैं जिन पर की गई नक्काशी देखने लायक है। शिवालय में दाखिल होते ही कारीगरों द्वारा तराशकर लगाए गए शीशे व शिवालय में चांदी पर की गई मीनाकारी श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
शिवालय में स्थापित किया गया शिवलिंग महाराजा विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन से लाया गया है। इस शिवलिंग की पूजा अर्चना के लिए काशी से लाए गए विद्वान ज्योतिषाचार्य पंडित घनश्याम शर्मा की देखरेख में प्रतिदिन रूद्राभिषेक, शिवमहिमा स्तोत्र, शिव तांडव, शुक्ल यजुर्वेद का पाठ, दुर्गा सप्तशती व आरती की जाती है। शिवालय व नंदी जी के सामने निर्मित की गई मनमोहक भगवान शिव की प्रतिमा अपने आपमें ऐतिहासिक है। 35 फुट लंबे व 35 फुट चौड़े प्लेटफार्म पर स्थापित 108 फुट ऊंची शिव प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा है। मात्र सवा साल में 600 टन की इस प्रतिमा का निर्माण पिलानी के प्रसिद्ध मूर्तिकार मातूराम द्वारा किया गया। इस पर तांबे की पॉलिश की गई व इस मूर्ति के तिलक, नाभि, कुंडल, कड़ों को सोने की चादर से बनाया गया है। प्रतिमा की जटों से गंगा अवतरण का दृश्य इसके रूप को चार चांद लगाता प्रतीत होता है। सायंकाल को विद्युत किरणों व उषाकाल के सूर्योदय के समय गंगा अवतरण से होने वाली जलधारा देखने योग्य है। इस प्रतिमा के ठीक सामने इटली की तकनीक के सहयोग से दिल्ली के विशेषज्ञों द्वारा ऊं नमो शिवाय: शब्द पर आधारित फव्वारा दूरदराज तक के लोगों के लिए एक अनूठा दृश्य प्रस्तुत करता है।
बाबा तारा की कुटिया परिसर में 5 हजार फुट लंबी तैयार की गई कृत्रिम गुफा के मुख पर हनुमान जी विराजमान किए गए हैं। गुफा के भीतर जंगल के प्राकृतिक दृश्यों के बीच ब्रह्मलीन बाबा तारा जी के जीवन से संबंधित झांकियां बनाई गई हैं। इसके अलावा गुफा के भीतर बाबा अमरनाथ के हिम शिवलिंग, कैलाश पर्वत, 12 ज्योतिर्लिंग आदि के कृत्रिम दृश्य व गुफा के दूसरे छोर के बाहर समुद्र मंथन का दृश्य यहां आने वाले पर्यटकों को आत्मविभोर कर देते हैं। बाबा तारा की कुटिया लगभग 20 एकड़ में विकसित की गई है जिसमें श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु स्वचालित 140 किलोवाट व 125 किलोवाट के 5 जनरेट स्थापित किए गए हैं। कुटिया में लोगों के इलाज के लिए एक नि:शुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सालय का भी संचालन किया जा रहा है जहां उच्च स्तर की कंपनियों की दवाइयों से जरूरतमंद मरीजों का उपचार किया जाता है। कुटिया प्रांगण में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के लिए एक विशाल शैड का निर्माण भी किया गया है। कुटिया समिति द्वारा शहर के विभिन्न चौराहों से मात्र एक घंटे के अंतराल में वाहन सुविधा उपलब्ध करवाई जाती है।
कुटिया में आने वाले श्रद्धालुओं को नाममात्र कीमत पर देसी घी से निर्मित दोपहर भोज की व्यवस्था भी की जाती है। भोजन के लिए वातानुकूलित हट्स भी स्थापित किए गए हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के झूलों की भी व्यवस्था है। बाबा तारा कुटिया में अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर की भी शुरूआत की गई है जिसमें हजारों लोगों की आंखों का उपचार व ऑप्रेशन किया जा चुका है। बाबा तारा के तीसरे निर्वाण दिवस के अवसर पर कुटिया में अतिरूद्र महायज्ञ 251 वेदपाठियों द्वारा किया गया था जो रावण के काल के उपरांत पहली बार हुआ। कुटिया में देशभर के ख्याति प्राप्त साधु महात्मा भी लगातार आध्यात्मिक गंगा बहाने के लिए समय-समय पर आते रहते हैं। इसके अलावा अनेक फिल्मी हस्तियां व गायकों ने इस तपोभूमि पर अपनी कला का जलवा बिखेरा है। दिन प्रतिदिन इस कुटिया में विकास कार्य तेजी से करवाए जा रहे हैं जिससे आने वाले एकाध वर्ष में ही कुटिया अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करेगी।
लम्हे खता करते हैं और सदियां सजा पाती हैं
देश अपनी आजादी की 64वीं वर्षगांठ मना रहा है। अंग्रेजों से मुक्ति के बाद देश ने विकास के क्षेत्र में अंगड़ाई ली है और आज विश्वशक्तियों के मुकाबले की स्थिति में आया है। इन 50-60 सालों में देश का राज-समाज बदला है। घर की वर्जनाओं को तोड़कर महिलाओं ने भी विभिन्न खित्तों में अपनी पहचान कायम की है। युवा शक्ति में नेतृत्व संभालने का माद्दा पैदा हुआ है और खाद्यान्न के मामले में देश आत्मनिर्भर हुआ है। भारत ने जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान के नारे को सार्थक सिद्ध करते हुए रक्षा, खाद्यान्न और विकास के क्षेत्र में जो अभूतपूर्व तरक्की की है, उसे देखकर तीसरी दुनिया के देश भी दांतों तले उंगली दबाने को विवश हैं। हमारी मुद्रा को नई पहचान मिली है। हमारे अस्तित्व को दुनिया मानने लगी है और हमारी विरासत और संस्कृतियों के अनूठे संगम को पाश्चात्य सभ्यता से ओतप्रोत देश भी अपनाने लगे हैं। योग और शिक्षा के मामले में इस विश्वगुरू देश की ख्याति को आज पंख लगे हुए हैं तो कितनी ही कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स ने देश को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। कितनी ही ममता सौदा और ममता खरब ने खेल को उसके मुकाम पर पहुंचाया है तो राजनीति के क्षेत्र में उतरकर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में वे पीछे नहीं रही हैं। लेकिन इन सब चीजों के बीच जो हमने खोया है, उसे पाने के लिए नई पीढिय़ों को जमाने लग जाएंगे। हमने सुना है जब बुजुर्ग कहा करते थे कि लम्हे खता करते हैं और सदियां सजा पाती हैं। आज भारत के साथ वही हो रहा है। भ्रष्टाचार और बढ़ती आबादी आज देश के लिए सबसे बड़ी समस्या बनकर खड़े हो गए हैं। परिवार नियोजन के तमाम हरबे सिर्फ किताबी नजर आते हैं और जमीनी तौर पर इसके लिए पर्याप्त कार्य नहीं हो रहा। यह अलग बात है कि जागरूकता बढ़ी है और लोगों ने स्वत: ही कम बच्चों के सिद्धांत को अपनाया है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भ्रष्टाचार को देश ने एक तरह से जरूरी तौर पर ही स्वीकार कर लिया है। देश का युवा वर्ग जिस संस्कृति को अपना रहा है वह हमारी परंपरा, संस्कृति, संस्कार और विचारधारा से कोसों दूर है। हालात यह हैं कि इंसां से हुआ पशु पराजित, नंगेपन की होड़ में, दो कौड़ी का नेता बिकता पूरे ढ़ाई करोड़ में। कहीं तन ढकने को वस्त्र नहीं तो कहीं तन ढकने का शौक नहीं। पिज्जा, बर्गर, हॉट डॉग की संस्कृति ने हमारे क्षीर, मालपुवे के संस्कारों को तिरोहित करके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने की कुत्सित कोशिशें की तो देश के लोगों ने भी मिलावट के धंधे को शॉर्ट कट मेथड बना लिया। दवाइयां, खाद्य पदार्थ, मिर्च मसाले और यहां तक कि वनस्पति को भी दूषित करने की कोशिशें होने लगी। चिंताजनक और शर्मनाक यह है कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था इस तरफ तोताचश्मी तेवर अख्तियार किए हुए है। देशभक्तों के इस भारत ने उन तमाम ज्ञात-अज्ञात शहीदों को बिसरा दिया जिनके कारण देश को यह दिन नसीब हुए थे। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के हर नागरिक को यह प्रण लेना होगा कि आपसी भ्रातृृभाव और ईमानदारी के भारतीय सिद्धांत को बल प्रदान करते हुए देश की एकजुटता, सभ्यता, संस्कृति, परंपरा और सद्भाव को बचाने के लिए काम करें। तभी हमारा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने के प्रयास सार्थक गिने जाएंगे।
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